धमतरी कस्टोडियल डेथ: लोकतंत्र में पुलिस बर्बरता की भयावह तस्वीर

धमतरी पुलिस हिरासत मौत ने लोकतंत्र की कमजोरी उजागर की। यह घटना पुलिस बर्बरता, मानवाधिकार हनन और जवाबदेही की गंभीर जरूरत को दिखाती है।

हिंदी: Oct 9, 2025 - 22:40
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धमतरी कस्टोडियल डेथ: लोकतंत्र में पुलिस बर्बरता की भयावह तस्वीर

CURATED BY – RAJEEV KHARE CITYCHIEFNEWS

धमतरी, धमतरी जिले में पुलिस हिरासत में हुई मौत कोई साधारण घटना नहीं है। यह सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की उस कमज़ोरी की पहचान है जहाँ संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का गला पुलिसिया बूटों तले दब जाता है।

मौत के पीछे की कहानी
एक धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तार युवक अदालत की पेशी के बाद जब थाने पहुँचा था, तब वह स्वस्थ था। कुछ ही घंटों बाद उसकी लाश पुलिस की निगरानी में अस्पताल से निकली। पोस्टमार्टम में 24 चोटों के निशान और दम घुटने से मौत की पुष्टि ने इस “अचानक तबीयत बिगड़ने” वाली पुलिस की कहानी को ध्वस्त कर दिया।
“कस्टोडियल बर्बरता” की न्यायिक मुहर
हाईकोर्ट ने बिल्कुल सही कहा कि यह “कस्टोडियल बर्बरता” है। अदालत का यह बयान महज टिप्पणी नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। संविधान का अनुच्छेद 21 — जीने का अधिकार — तब सबसे ज़्यादा असुरक्षित हो जाता है जब नागरिक स्वयं राज्य के संरक्षण में हों। पुलिस थाने और जेलें किसी लोकतंत्र की परीक्षा का आईना होती हैं। यदि वहाँ इंसाफ की बजाय अत्याचार होता है, तो यह लोकतंत्र पर सीधा हमला है।
जवाबदेही का सवाल
राज्य सरकार ने मामले में निलंबन और मुआवजे की घोषणा कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी, ऐसा मान लिया गया। लेकिन क्या यह पर्याप्त है? सवाल यह है कि –
• क्या सिर्फ एक थानेदार का निलंबन पूरी व्यवस्था की सफाई है?
• क्या मुआवजे की रकम नागरिक के खोए जीवन और उसके परिवार के दर्द की भरपाई कर सकती है?
• और क्या उच्चाधिकारियों तक जवाबदेही तय होगी?
हमारे देश में कस्टोडियल डेथ अक्सर “दुर्भाग्यपूर्ण” कहकर रफा-दफा कर दी जाती हैं। लेकिन हर ऐसी मौत पुलिस की कार्यप्रणाली और मानवाधिकारों पर काला धब्बा छोड़ जाती है।
पुलिस सुधार की आवश्यकता
भारत में दशकों से पुलिस सुधार की बातें हो रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी कई ऐतिहासिक आदेश दिए — जैसे 2006 में प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार मामले में पुलिस को राजनीतिक दबाव से मुक्त करने और जवाबदेही तय करने के निर्देश। पर हकीकत यह है कि राज्यों ने इन पर अमल करने से कतराया।
धमतरी की यह घटना एक बार फिर से याद दिलाती है कि बिना स्वतंत्र जांच तंत्र, सीसीटीवी निगरानी और ठोस आंतरिक नियंत्रण व्यवस्था के, पुलिस हिरासत हमेशा भय और आशंका का केंद्र बनी रहेगी।
मानवाधिकार बनाम अपराध नियंत्रण
कई बार तर्क दिया जाता है कि अपराधियों से सख्ती से निपटना ही कानून व्यवस्था बनाए रखने का उपाय है। लेकिन यह सोच खतरनाक है। यदि राज्य खुद ही कानून तोड़ने लगे, तो नागरिकों के पास भरोसा करने के लिए क्या बचेगा? अपराधी से निपटने के नाम पर यदि किसी की जान पुलिस हिरासत में चली जाए, तो यह पूरे समाज के लिए खौफनाक संदेश है — कि कानून न्याय का नहीं, बल्कि ताकतवर की हिंसा का औजार है।
आगे का रास्ता
धमतरी प्रकरण से निकलने वाले कुछ स्पष्ट सबक हैं:
1. स्वतंत्र जांच एजेंसी: पुलिस हिरासत में हर मौत की जांच स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए, ताकि निष्पक्षता बनी रहे।
2. सीसीटीवी निगरानी: थानों और हिरासत कक्षों में सीसीटीवी कैमरों की निगरानी सुनिश्चित की जाए और उनकी रिकॉर्डिंग सार्वजनिक हो।
3. व्यक्तिगत जवाबदेही: केवल निचले अधिकारियों पर नहीं, बल्कि पूरे कमांड चैन पर जिम्मेदारी तय हो।
4. मानवाधिकार प्रशिक्षण: पुलिस बल को यह सिखाना ज़रूरी है कि अपराध नियंत्रण और मानवाधिकार उल्लंघन दो अलग चीजें हैं।
5. न्यायपालिका की सक्रियता: अदालतों को ऐसे मामलों में स्वतः संज्ञान लेकर त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए।
धमतरी की यह कस्टोडियल डेथ कोई अलग-थलग घटना नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का हिस्सा है जिसमें पुलिस की “ताकत” अक्सर नागरिक के अधिकारों से बड़ी हो जाती है। यदि लोकतंत्र को सचमुच मजबूत बनाना है, तो राज्य को यह मानना होगा कि थाने और जेलें सिर्फ अपराध नियंत्रण के केंद्र नहीं, बल्कि मानवाधिकारों की सबसे बड़ी कसौटी हैं।
यदि इस कसौटी पर बार-बार विफलता मिलती है, तो यह न केवल पुलिस पर, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे पर सवाल खड़ा करता है। और यही सवाल धमतरी की उस लाश से आज हम सबको घूर रहा है।

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